उत्तरकाशी जनपद के दूरस्थ मोरी ब्लॉक स्थित सौड़-सांकरी गांव इन दिनों लोक आस्था और संस्कृति के रंग में रंगा हुआ है। क्षेत्र में चल रहे पारंपरिक देवगोती मेले के बीच यहां आयोजित मैती ध्याणी मिलन कार्यक्रम ने माहौल को और भी भावुक व उल्लासपूर्ण बना दिया। दूर-दराज़ ब्याही बेटियां (ध्याणियां) अपने मायके पहुंचीं, जहां ग्रामीणों ने उनका पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ स्वागत और सम्मान किया।
सोमेश्वर महाराज की डोली संग तांदी और रासो
मेले के दौरान ध्याणियों ने अपने आराध्य Someshwar Mahadev की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। चुनरी, श्रीफल और अन्य भेंट अर्पित कर परिवार व क्षेत्र की खुशहाली की कामना की। इसके बाद देव डोली के साथ पारंपरिक तांदी और रासो लोकनृत्य प्रस्तुत किए गए। ढोल-दमाऊं की थाप पर गूंजते लोकगीतों ने पूरे गांव को उत्सव में डुबो दिया।
दूर-दूर से पहुंचीं ध्याणियां
पंचगांई, अडोर, बडासु और सिंगतूर पट्टियों समेत कई गांवों से ब्याही बेटियां अपने मायके सौड़ पहुंचीं। पारंपरिक वेशभूषा में सजी ध्याणियों की मौजूदगी ने मेले की शोभा बढ़ा दी। ग्रामीणों की ओर से उन्हें स्मृति-चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया।
ग्रामीण चैन सिंह रावत ने बताया कि सोमेश्वर महाराज का देवगोती मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। यह आयोजन रिश्तों की मिठास, बेटी-मायके के भावनात्मक संबंध और सामुदायिक एकता को भी मजबूत करता है।
संस्कृति और आस्था का संगम
मोरी क्षेत्र में कई दिनों से चल रहे देवगोती मेले में ग्रामीण अपने आराध्य देवता के साथ रासो-तांदी और पारंपरिक गीतों के माध्यम से श्रद्धा प्रकट कर रहे हैं। इस दौरान गांव में ऐसा नजारा देखने को मिला, जहां लोक आस्था, पारंपरिक परिधान और सामूहिक उत्सव ने पहाड़ की समृद्ध संस्कृति की झलक पेश की।
सौड़-सांकरी में आयोजित यह मैती ध्याणी मिलन कार्यक्रम न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं को सहेजने का एक सुंदर उदाहरण भी साबित हुआ।
