उत्तराखंड के प्रसिद्ध धाम Kedarnath Temple और Badrinath Temple एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार मामला इन धामों के मुख्य पुजारियों यानी “रावल” से जुड़ा है, जिसे लेकर कई सवाल और विवाद सामने आ रहे हैं।

दरअसल, आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपरा के तहत इन दोनों धामों में दक्षिण भारत से आने वाले ब्राह्मणों को रावल नियुक्त किया जाता है। इसका उद्देश्य उत्तर और दक्षिण भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक एकता को मजबूत करना माना जाता है।

बदरीनाथ धाम: रावल की खास परंपरा

चमोली जिले में स्थित बदरीनाथ धाम भारत के चारधामों में प्रमुख स्थान रखता है। यहां भगवान विष्णु के बद्रीनारायण स्वरूप की पूजा होती है। इस धाम में रावल की नियुक्ति एक विशेष प्रक्रिया के तहत होती है, जिसमें केवल केरल के नंबूदरी ब्राह्मणों को ही चुना जाता है।

रावल को वैदिक ज्ञान, संस्कृत और पूजा विधियों में दक्ष होना जरूरी होता है। नियुक्ति Badrinath-Kedarnath Temple Committee (BKTC) और राज्य सरकार की सहमति से होती है। बदरीनाथ में रावल ही गर्भगृह में प्रवेश कर मुख्य पूजा-अर्चना करते हैं और उन्हें कड़े धार्मिक नियमों, खासकर ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है।

केदारनाथ धाम: अलग है व्यवस्था

रुद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यहां रावल का चयन मुख्य रूप से कर्नाटक और दक्षिण भारत के वीरशैव/लिंगायत परंपरा से किया जाता है।

केदारनाथ में रावल को भगवान का प्रतिनिधि माना जाता है, लेकिन वे सीधे शिवलिंग को स्पर्श नहीं करते। यहां पूजा स्थानीय पुजारियों द्वारा की जाती है, जबकि रावल धार्मिक परंपराओं और अनुष्ठानों की देखरेख करते हैं।

क्या है मौजूदा विवाद?

चारधाम यात्रा 2026 से पहले रावल को लेकर दो बड़े विवाद सामने आए हैं—

  • केदारनाथ मामला: निवर्तमान रावल द्वारा अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करने की खबर के बाद BKTC ने उन्हें नोटिस भेज दिया है। समिति का कहना है कि रावल की नियुक्ति का अधिकार केवल उसके पास है और बिना अनुमति कोई निर्णय मान्य नहीं होगा।
  • बदरीनाथ मामला: एक पूर्व रावल का विवाह से जुड़ा वीडियो सामने आने के बाद ब्रह्मचर्य नियमों को लेकर बहस छिड़ गई है। कुछ धर्माचार्यों का कहना है कि रावल को आजीवन ब्रह्मचारी रहना चाहिए, जबकि समिति का मत है कि यह नियम केवल कार्यकाल तक ही लागू होता है।

प्रशासनिक हलचल भी तेज

इसी बीच Vijay Thapliyal, जो बदरी-केदार मंदिर समिति के सीईओ थे, उनकी प्रतिनियुक्ति भी समाप्त कर दी गई है। इससे प्रशासनिक स्तर पर भी स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

क्यों अहम है यह मुद्दा?

केदारनाथ और बदरीनाथ धाम केवल धार्मिक आस्था के केंद्र ही नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक एकता के प्रतीक भी हैं। रावल परंपरा उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने का एक अनोखा उदाहरण मानी जाती है। ऐसे में इस पद को लेकर उठे विवाद का असर श्रद्धालुओं और आने वाली चारधाम यात्रा पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल, सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इन विवादों का समाधान कैसे निकलेगा और चारधाम यात्रा से पहले स्थिति कितनी स्पष्ट हो पाती है।

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